अकेलापन की अधिकता: अपनी बात न सुनने वाले लोगों के बीच होना अकेलापन से भी अकेलापन महसूस होता है
अकेलापन की अधिकता: अपनी बात न सुनने वाले लोगों के बीच होना अकेलापन से भी अकेलापन महसूस होता है यह बात हमेशा से वास्तविकता रही है। कई बार हम अपने आसपास के लोगों के साथ होते हैं, लेकिन हमें उन्हें अपनी बात सुनाने या समझने का मौका नहीं मिलता है। ऐसे समयों में, हमारा मन अकेलापन और उदासी का सामना करता है, जो अकेले होने से भी अधिक दुखद होता है। इस ब्लॉग में, हम जानेंगे कि अपनी बात न सुनने वाले लोगों के बीच होना क्यों अकेलापन से भी अधिक अकेलापन महसूस होता है।
1. समझौता की अवधारणा:
जब हमारे आसपास के लोग हमारी बातों को नहीं सुनते, तो हमें अपनी भावनाओं और विचारों को समझाने की अवधारणा नहीं मिलती है। यह हमें महसूस कराता है कि हम अकेले ही हैं और हमारी मौजूदगी को कोई महत्व नहीं देता। इससे हमारी अंतरात्मा में एक अजीब महसूस होता है जो अकेलापन से भी अधिक अधिक होता है।
2. व्यक्तित्व की अनियमितता:
अपनी बात न सुनने वाले लोगों के साथ होने का अनुभव हमारे व्यक्तित्व को अनियमित बना देता है। हमें यह अनुभव होता है कि हमारी मौजूदगी का कोई महत्व नहीं है और हमारे विचारों को कोई नहीं समझता। इससे हमारा आत्मविश्वास कम हो जाता है और हमें खुद को अकेले और असमबोधित महसूस होता है।
3. संवाद की कमी:
जब हमारे आसपास के लोग हमारी बातों को नहीं सुनते, तो हमें संवाद की कमी महसूस होती है।